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बेटी अंकिता को मिला इंसाफ और उत्तराखंड में यह सिर्फ न्याय की जीत नहीं है, यह एक नई प्रशासनिक संस्कृति की शुरुआत है—जहां सरकार जनता की पीड़ा को समझती है और जवाबदेह रहती है  

 

बेटी अंकिता को मिला इंसाफ और उत्तराखंड में यह सिर्फ न्याय की जीत नहीं है, यह एक नई प्रशासनिक संस्कृति की शुरुआत है—जहां सरकार जनता की पीड़ा को समझती है और जवाबदेह रहती है

 

उत्तराखंड की धरती पर न्याय की वह घड़ी आखिरकार आ गई, जिसका बेसब्री से इंतजार था। अंकिता भण्डारी हत्याकांड में कोर्ट का फैसला आ चुका है—पुलकित आर्य, अंकित गुप्ता और सौरभ भरत को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। यह केवल एक सजा नहीं, बल्कि उस सख्त और जवाबदेह शासन की घोषणा है जिसकी कमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के हाथों में है।

इस पूरे मामले में धामी सरकार ने न केवल संवेदनशीलता दिखाई, बल्कि विलंब के बजाय निर्णय की गति को चुना। घटना के 24 घंटे के भीतर आरोपियों को जेल भेजना, SIT का गठन कर जांच को तेज़ और पारदर्शी बनाना, आरोपियों पर गैंगस्टर एक्ट लगाना, 500 पन्नों की चार्जशीट तैयार करना—ये सब दिखाता है कि जब सरकार गंभीर होती है, तो न्याय की प्रक्रिया न रुकती है, न झुकती है।

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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने परिवार को ₹25 लाख की आर्थिक मदद दी, साथ ही अंकिता के भाई और पिता को सरकारी नौकरी देकर एक व्यावहारिक सहानुभूति का परिचय दिया। सरकार ने तीन बार वकील बदले ताकि केस में कोई कसर न रह जाए और सरकारी वकील की दमदार पैरवी से बार-बार आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज होती रहीं।

यह फैसला बताता है कि मुख्यमंत्री धामी के राज में न कोई अपराधी बच सकता है, न ही कोई पीड़ित अकेला पड़ सकता है। उत्तराखंड की जनता आज भरोसे से कह सकती है कि उनकी सरकार उनके साथ है—सिर्फ वादों में नहीं, हर मुश्किल की घड़ी में, जमीन पर खड़ी होकर।

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इस फैसले से यह भी साबित हुआ कि धामी सरकार के राज में बेटियों की गरिमा और न्याय व्यवस्था दोनों सुरक्षित हैं। मुख्यमंत्री ने साबित किया है कि वे न तो दबाव में झुकते हैं और न ही संवेदनाओं को अनसुना करते हैं। उन्होंने कहा था—“न्याय में देरी नहीं होगी और अपराधियों के लिए कोई रहम नहीं होगी”, और आज वही हुआ।

उत्तराखंड में यह सिर्फ न्याय की जीत नहीं है, यह एक नई प्रशासनिक संस्कृति की शुरुआत है—जहां सरकार जनता की पीड़ा को समझती है और जवाबदेह रहती है।

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